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अमरूद की खेती कैसे करें जानें,लागत, उगाने का समय, खाद उर्वरक, उत्पादन एवम् बचत सहित जाने पूरी जानकारी

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By admin
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अमरूद की खेती कैसे करें: बढ़ती खेती की लागत एवम् आमदनी में कमी के चलते किसान साथी लगातार पारंपरिक खेती को छोड़कर आधुनिक खेती की ओर अपना रूझान बढ़ा रहे हैं, क्योंकि इस समय देश की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, एवम् उत्पादन में इतनी बढ़ोतरी नहीं हो रही, मांग सप्लाई में अंतर बना हुआ है , दूसरी ओर पारंपरिक खेती मै इस समय बचत काफी कम हो गई है क्योंकि समय के अनुसार बदलना ही समझदार व्यक्ति माना जाता है।

इस समय किसान आवश्यकता के अनुसार पारंपरिक खेती करते हुए लाभ नही ले पा रहे, इस खेती से उभकर अब उद्यान यानि फलों की खेती जैसे-अमरूद, पपीता, संतरा, आम, केला, चीकू, बेर, सेब, आदि की खेती करने में अपनी रुचि दिखा रहे हैं, फलों की खेती करके किसान अच्छा लाभ कमा सकते है क्योंकि इस समय फलों की बाजारों में भारी डिमांड बढ़ गई है, घरेलू बाजारों की आपूर्ति के साथ साथ विदेशो मै भी भारतीय फलों की भारी मांग है परंतु सप्लाई की कमी बनी हुई है, अतः किसान फलों की खेती करके बेहतर लाभ ले सकते है।

किसान साथी यदि पारंपरिक खेती को छोड़कर आधुनिक खेती करने के इच्छुक हैं तो इन फलों में से अमरूद की खेती कर सकते है, जो आसानी से उगाकर अच्छा लाभ ले सकते हैं, उतर भारत खासकर, हरियाणा राजस्थान पंजाब मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश बिहार एवम् उतराखंड ओर हिमाचल में इसकी खेती पिछले सालों में काफ़ी लोकप्रिय खेती बन रही है, एवम् किसान अच्छा लाभ कमा रहे हैं तो किसान साथियों आज हम अमरूद की खेती के बारे में विस्तृत जानकारी आपके साथ सांझा करेंगे, जिसमे प्रति एकड़ लागत से लेकर अमरूद के लिए उर्वरक, खाद बीज एवम् उगाने का सही समय क्या रहेगा आदि…

अमरूद की खेती के लिए मिट्टी एवम् किस समय उगाए

अमरूद की कृषि हेतू उगाने का उचित समय फरवरी- मार्च या सितंबर- अक्टूबर में सही माना गया है, बुवाई से पहले 2 बार जमीन की तिरछी एवम् उसके बाद सीधी जुताई करे, अमरूद फसल सख्त किस्म की खेती है, इसकी खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, इसकी खेती 6.5 से 7.5 PH मान वाली भूमि पर आसानी से की जा सकती है, हालांकि गहरे तल वाली चिकनी रेतीली मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है,

अमरूद की खेती के लिए उर्वरक खाद की मात्रा

वही उर्वरक की बात की जाए तो जब पोधा 1 से 3 साल का हो जाए उस समय 10 से 20 किलो देसी खाद,150 से 200 ग्राम यूरिया,500 से 1500 ग्राम सुपर फास्फेट एवम् 100 से 400 ग्राम सुपर ऑफ सुपर फास्फेट प्रति पौधे में प्रयोग उचित है। यदि पोधा 4 से 6 साल का हो उस समय देसी खाद की मात्रा प्रति पोधा 25 से 40 किलो, सिंगल फास्फेट की मात्रा 1500 से 2000 ग्राम, यूरिया 300 से 600 ग्राम एवम् 500 से 1000 ग्राम म्यूरेट ऑफ सुपर प्रति पौधा डालनी उचित रहती है। देशी खाद को पहले एवम् अन्य खाद को साल में दो बार यानि मई जून एवम् सितंबर अक्तूबर में देनी चाहिए।

 

 

प्रति एकड़ अमरूद की खेती में लागत

अमरूद कृषि हेतू आप 12×8 फीट के ग्राफ को लेकर अमरूद के पौधे की रोपाई करते हैं यानि लाइन से लाईन पौधे की दूरी 12 फीट रहेगी एवम् एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 8 फीट रहेगी, इस हिसाब से 1 एकड़ में तकरीबन 450 पौधे लगाए जा सकते है। ऐसे में मार्केट में 1 पौधे की कीमत तकरीबन 50 से 75 रुपए रूपए का मिल जाता है, यानि एक एकड़ में तकरीबन लागत 31500 से 32000 हज़ार रुपए लगेगी।

खाद एवम् उर्वरक की लागत
अमरूद की खेती में पहले साल एक पौधे में अधिकतम 3 से 6 किलो वर्मीकम्पोस्ट उर्वरक की आवश्यकता पड़ती है, यानी एक एकड़ में तकरीबन 22 क्विंटल तक अधिकतम वर्मीकम्पोस्ट खाद अधिकतम लगेगी, यदि एक क्विंटल उर्वरक की कीमत 700 रुपए लगाए तब एक वर्ष में 15400 रुपए का खर्चा पड़ेगा।

1.अमरूद की खेती का खर्च इस प्रकार रहेगा

* रोपण सामग्री की लागत कुल 2200 रुपए
* खाद एवं उर्वरक की लागत 5000 रुपए
* कीटनाशक एवं कीटनाशक लागत 2000 रुपए
* श्रम की कुल लागत 7700 रुपए
* अन्य खर्च 3600 रुपए
खेती भूमि पर कुल खर्च 20,500 रुपए

2. सिंचाई हेतू खर्चा
* ट्यूबवेल/सबमर्सिबल पंप 40000 रुपए

3. ड्रिप/स्प्रिंकलर की लागत 20000 रुपए

4.इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्चा
* पंप हाउस एवं लेबर शेड 10,000 रुपए
* कृषि उपकरण 1,000 रुपए
* कुल खर्च 11,000 रुपए

5. भूमि विकास हेतु खर्चा
* मिट्टी समतल करना 4000 रुपए
* बाड़ लगाना 29500 रुपए

कुल खर्च 1,25,000

 

एक एकड़ में अमरूद उत्पादन

पहले साल अमरूद की 3जी कटिंग के माध्यम से साखाओ की संख्या बढ़ा सकते है, पहले वर्ष पौधो की ऊंचाई की बजाय टहनियां बढ़ाने हेतु प्रयास करें, जैसे ही दूसरे साल फल लगते हैं इस समय 20 किलो प्रति पोधा उत्पादन देने लगेगा, इस हिसाब से यदि 400 पौधे ही उत्पादन माल ले तब 80 क्विंटल तक उत्पादन प्रथम वर्ष लिया जा सकता है। तीसरे वर्ष प्रति पोधा 25 किलो के हिसाब से कुल उत्पादन 100 क्विंटल और चौथे वर्ष 30 किलो प्रति पोधा के हिसाब से कुल उत्पादन 120 क्विंटल लिया जा सकता है। इस प्रकार उत्पादन और बढ़ता चला जाता है।

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