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चने की फसल में फफूंद एवम् उखड़ा रोग : चने की फसल को उकठा रोग एवम् फफूंदी रोग से बचाने के ये है आसान उपाय

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By admin
8 Min Read

चने की फसल में फफूंद एवम् उखड़ा रोग (उकठा रोग) काफी समस्या पैदा करते हैं। इस मौसम में चने की फसल में अनेक प्रकार के कीट एवम् रोग दिखाईं देने लगते हैं जो फसलों को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते, जनवरी एवम् फरवरी माह में जैसे ही तापमान कम होने लगता है उस समय चने फसल में ये कीट एवम् उखड़ा के साथ साथ फफूंद जैसे रोग अपना रूप दिखाने लगते हैं। यदि सही समय पर इन रोगों के ईलाज का उपाय न किया जाए तो यह संपूर्ण फसल को बर्बाद कर देते हैं, जिससे फसल उत्पादन काफी कम हो जाता है एवम् किसानों की संपूर्ण मेहनत भी बर्बाद हो जाति है। आज के इस लेख में हम चने की फसल पर फफूंद रोग एवम् उखड़ा रोग के लगने के कारण, बचाव के तरीके व चने की फसल में लगने वाले अन्य रोगों के बारे में संपूर्ण जानकारी देने की कोशिश करेंगे।

चने की फसल में फफूंद रोग एवम् उखड़ा रोग की समस्या

मौसमी बदलाव के चलते इस समय अनेक स्थानों पर चने की फसल में फफूंद रोग , कीट रोग एवम् उखड़ा रोग का प्रकोप बढने की ख़बर मिल रही है, राजस्थान एवम् मध्य प्रदेश के कई इलाकों में यह समस्या काफी देखी जा रही है, तो किसान कुछ आसान तरीके से इन रोगों पर नियन्त्रण पा सकते है ताकी किसी प्रकार की आर्थिक हानि न उठानी पड़े एवम् चने की खेती से अच्छा लाभ ले सके, तो चलिए जानते हैं आज की विस्तृत जानकारी…

ये हैं चने की फसल के प्रमुख कीट एवं रोग

चने की फसल में उखड़ा रोग (उकठा) बहुत बडी समस्या पैदा कर रहा है, इसके अलावा फफूंद रोग जैसे चांदनी, धूसर फफूंद, हरदा एवम् स्टेमफिलियम ब्लाईट प्रमुख रोग हैं।, इसके अलावा अन्य रोग फली छेदक. कटवा सुंडी एवम् झुलसा रोग भी चने की फसल में नुकसान पहुंचा सकते है, यदि किसान साथी समय पर इन कीटों पर नियन्त्रण कर ले तो अच्छा लाभ कमा सकते है।

चने की फसल में उखेडा रोग (उकठा रोग) कारण एवम् लक्षण

मौसम में बदलाव के कारण चने में अनेक प्रकार के रोग लगने लगते हैं इसमें प्रमुख उखेडा रोग जो फसल को बर्बाद करने में कोई कसर नही छोड़ता। इस रोग से उचित प्रबंध करके किसान फसल बर्बाद हो होने से बचा सकते है। कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर के विशेषज्ञ डॉ बताते हैं कि इस रोग का प्रभाव खेत मे छोटे छोटे टुकड़ों मे दिखाई दिखाईं देने लगता है, शुरुवात में पौधे की ऊपरी पतियां मुरझाने लगती है उसके बाद धीरे-धीरे पूरा पौधा सूखकर खत्म हो जाता है, जड़ के पास तने को चीरकर देखने पर वाहक ऊतकों मे कवक जाल धागेनुमा काले रंग की संरचना के रूप मे दिखाई देने लगता है।

उखेडा रोग से बचाने के उपाय

उखेडा रोग नियंत्रण नियंत्रण हेतू किसान साथी ट्राइकोड्रर्मा पाउडर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोंपचार करें, एवम् इसके साथ चार किलोग्राम ट्राइकोड्रर्माको 100 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद मे मिलाकर बुवाई से पहले प्रति हैक्टयर की दर से खेत मे मिलाएं, यदि इस रोग के लक्षण खड़ी फसल मे दिखाई देने लगे तब कार्बेन्डाजिम 50 डब्लयू.पी.0.2 प्रतिशत घोल का पौधों के जड़ क्षेत्र मे छिड़काव कर दे।

 

चने की फसल में फंफूद रोग चांदनी के लक्षण एवम् रोकथाम

यह रोग चने की फसल में एस्कोकाइटा रेबी नामक फफूंद के कारण फैलता है। यह रोग सर्दियों में अधिक नमी एवम् तापमान में कमी के कारण फैलने से फसल में नुकसान करता है। इस रोग से चने के पौधे के निचले हिस्से पर गेरूई रंग के भूरे कत्थई रंग के धब्बे पड़ जाते हैं, जो संपूर्ण पौधे को धीरे धीरे सुखा देता है, इस रोग से प्रभावित चने के पौधे की पत्ति, फूल एवम् फलियों पर हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाईं देने लगते हैं, इस रोग के फैलने पर केप्टान या फिर मेंकोजेब, या फिर क्लोरोवेलोनिल 2- 3 ग्राम की दर से प्रति/लीटर पानी में घोलकर फसल में 2 से 3 बार छिड़काव करके रोग से मुक्ति मिल जाएगी।

 

चने में धूसर फफूंद रोग लक्षण एवम् रोकथाम

चने में धूसर फफूंद रोग का प्रमुख कारण वोट्राइटिस साइनेरिया नामक फंफूद से होता है, यह रोग उस समय अधिक फैलता है जब फूल आने लगे या पूर्ण पकने की कगार पर हो, इस का प्रमुख लक्षण उस समय दिखाईं देता है आसमान में आद्रता अधिक हो जिससे पोध पर काले एवम् भूरे धब्बे दिखाईं देने लगते हैं। साखाओ व तनों पर जहां फफूंद रोग संक्रमित करता है उस स्थान पर काले एवम् भूरे रंग के धब्बे दिखाईं देने लगते हैं, स्क्रमित पौधे में फूल झड़ने लगते हैं एवम् फलियां सम्पूर्ण पकाव ले पाती एवम् दाने सिकुड़े से बनते हैं बोट्राइटिस ग्रेमोल्ड के लक्षण दिखने पर किसान साथी केप्टान/काबेंडाजिम/ मेंकोजेब/ क्लोरोथेलोनिल इनमे से कोई दवाई का इस्तेमाल एक सप्ताह के अंतर पर 3 बार कर दे, ताकि रोग के प्रकोप पर नियन्त्रण पा सके।

चने की फसल में झुलसा रोग लक्षण एवम् रोकथाम के उपाय

इस रोग का प्रमुख लक्षण पौधे की निचली पतिया पीली पड़कर झड़ने लगती है, इस रोग में शुरुवाती दिनों में बैंगनी रंग एवम् भूरे के धब्बे दिखाईं देने लगते हैं, इस रोग ( jhulsa rog) से पौधे के फूल गिरने लगते हैं जिसके कारण फलियां नही बन पाती, इस रोग के रोकथाम हेतु किसान साथी मैन्कोजेब (75% WP) 2 ग्राम प्रति/लीटर के हिसाब से पानी में घोलकर चने की फसल में छिड़काव कर दे , इससे रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

फफूंद जनित हरदा रोग लक्षण एवम् रोकथाम हेतु उपाय।

यह रोग चने में एरोटीनी यानि यूरोमाईसीज साइसरीज नामक फंफूद के कारण फैलता है, यह रोग सर्दी के मौसम में तापमान में कमी, पौधे की अत्यधिक बढ़ोतरी एवम् मिट्टी में अधिक नमी के चलते फैलता है, इस रोग के प्रमुख लक्षण में तना, फलियो, पतियों आदि में प्याली के आकार के भूरे रंग एवम् काले के फफोले बनने लगते हैं, इसके बाद पोधा धीरे धीरे सूखने लगता है।

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